Tuesday, 26 June 2012

गजल-

गजल-२४

कने काल लै जे काज लसियैल जाय छै 
ओ अहिना दिने -दिन बसियैल जाय छै 

जकरा बूइध में छलैयै वियैधि धेने 
आब बुइधिए सँ ओहो खियैल जाय छै 

पहिने दूधो - दही के नञि नपना छलै 
आब नापिए क पाइनो पियैल जाय छै 

जों धिया के वियाह मांग अनुचित भेलै
बेटा बेचै लय बोगली सियैल जाय छै

जाबे तौला भरल ताऽ तऽ सुरसुर केलौं
आब जोड़ण लै टोल छिछियैल जाय छै

मूंह देखिये कऽ मुंग्बा बाँटय के चलन
एत भेटै नै किछु सभ दियैल जाय छै

छलै करनी ई कारण आ की कुसमय
किछु निरोगो जे छल बझियैल जाय छै

कतौ आंचे ओतेऽ नञि की इनहोर हेतै
कतौ धधरा ततेऽ जे उधियैल जाय छै

कामना में "नवल" होश सभके मतल
कियै जोशक लहरि भसियैल जाय छै

--- वर्ण- १५ ---
(सरल वर्णिक बहर)
►नवलश्री "पंकज"◄
< २७.०६.२०१२ >

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